इस दर्दनाक घटना ने एक तरफ जहां एक हंसता-खेता परिवार उजाड़ दिया है, वहीं वन विभाग के सुरक्षा दावों और लचर कार्यप्रणाली की पोल खोलकर रख दी है
पलक झपकते बुझा घर का चिराग …..
मिली जानकारी के अनुसार, करमचंद सुबह के वक्त अपनी दैनिकचर्या के सिलसिले में जंगल की ओर गया था, इसी दौरान उसका सामना अचानक एक आक्रामक हाथी से हो गया जब तक वह संभल पाता, हाथी ने उस पर हमला कर दिया और मौके पर ही उसकी जान ले ली
घटना की सूचना मिलते ही चंद्रौरा पुलिस मौके पर पहुंची, और शव को अपने कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए प्रतापपुर लाया गया। वन विभाग की ओर से पीड़ित परिवार को तत्काल सहायता राशि के रूप में 25,000 रुपये की राशि प्रदान की गई जो इस बड़ी त्रासदी के आगे ऊंट के मुंह में जीरे समान है।
सवालों के घेरे में विभाग की कार्यप्रणाली और अधिकारियों की सुस्ती ……
इस दर्दनाक घटना के बाद स्थानीय ग्रामीणों और आदिवासियों में वन विभाग के खिलाफ भारी आक्रोश है, घटना से जुड़े कुछ सवाल जो सुरक्षा व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े करते हैं जिनमें अधिकारियों की गैर-जिम्मेदारी और जवाबदेही, है जो गंभीर आपात स्थिति के दौरान स्थानीय जिम्मेदार वन अधिकारियों से संपर्क तक नहीं हो पाना विभाग की लचर कार्यशैली को उजागर करता है ऐसे में सवाल यह है कि ग्रामीण अपनी जान बचाने के लिए गुहार किससे लगाएं
कथित तौर पर ट्रेकिंग और चेतावनी तंत्र का अभाव …..
क्या वन विभाग के पास हाथियों के मूवमेंट को ट्रैक करने और ग्रामीणों को समय रहते अलर्ट करने का कोई ठोस या आधुनिक तंत्र मौजूद नहीं है
इन त्रासदियों और प्रशासनिक लापरवाही का सबसे बड़ा खामियाजा हमेशा हाशिए पर ज्यादातर गरीब आदिवासी समाज ही भुगतते आ रहे हैं
सुलगता आक्रोश और कागजी सुरक्षा के खोखले दावे …..
हर दिन जंगल से लगे गांवों में किसी न किसी बेकसूर की जान जा रही है, लेकिन वन विभाग की नींद कागजी बैठकों और दावों से बाहर नहीं आ रही है, ग्रामीणों के सब्र का बांध अब टूटने लगा है, यदि हाथियों की निगरानी और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम जल्द धरातल पर नहीं उतरे, तो यह जन-आक्रोश किसी बड़े जन-आंदोलन का रूप ले सकता है।
बड़ा सवाल, क्या वन विभाग किसी और बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है, या फिर हाथी प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले इन बेसहारा ग्रामीणों को यूं ही खौफ के साए में जीने के लिए छोड़ दिया जाएगा?
इस संवेदनशील और गंभीर मुद्दे पर स्थानीय प्रशासन और शासन स्तर से ठोस प्रशासनिक कदमों की उम्मीद की जा रही है, ताकि भविष्य में किसी अन्य परिवार का चिराग न बुझे।





