सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब पदोन्नति में कोई कानूनी या तकनीकी अड़चन नहीं है तब भी जिम्मेदार अफसरशाही फाइलें दबाकर क्यों बैठी है

मुख्य प्रशासनिक और मैदानी बदहाली के आंकड़े जिनमें विभाग में अपर संचालक के 8, संयुक्त संचालक के 4 और उप संचालक के 6 महत्वपूर्ण पद लंबे समय से खाली पड़े हैं।

प्रभार के भरोसे महकमा …….

आधा दर्जन से अधिक जिलों में जिला कृषि अधिकारी (DDA) के पद और लगभग सभी जिला व विकासखंड कार्यालय केवल अतिरिक्त प्रभार के सहारे चलाए जा रहे हैं।

SADO के 280 पद रिक्त …..

मैदानी स्तर पर योजनाओं के क्रियान्वयन और गुणवत्ता नियंत्रण के लिए रीढ़ माने जाने वाले वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी (SADO) के 280 पद खाली हैं जिससे पात्र अधिकारी अपने हक के लिए दर-दर भटक रहे हैं।

करोड़ों की लैब बनी शो-पीस ……

बीज, खाद और कीटनाशकों के परीक्षण के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर बनाई गईं 8 अति-आधुनिक प्रयोगशालाएँ विश्लेषकों की कमी के कारण ताले में बंद या शो-पीस बनी हुई हैं।

किसानों के हितों पर सीधा कुठाराघात ……

लैबों के बंद रहने और SADO के सैकड़ों पद खाली होने का सीधा असर बाजार की निगरानी पर पड़ रहा है। अमानक खाद, नकली बीज और घटिया कीटनाशकों की धरपकड़ पूरी तरह ठप हो चुकी है। इसका खामियाजा प्रदेश के अन्नदाताओं को भुगतना पड़ रहा है, जो हर सीजन में ठगी का शिकार होने को विवश हैं।

बिना किसी ठोस वजह के पदोन्नति रोककर रखना न केवल प्रशासनिक विफलता की पराकाष्ठा है, बल्कि यह सीधे तौर पर किसानों के जीवन और अधिकारों के साथ खिलवाड़ है। यदि शासन-प्रशासन ने इस गंभीर मामले पर तत्काल सुधि नहीं ली, तो प्रदेश का पूरा कृषि तंत्र और किसान वर्ग एक बड़े संकट की ओर धकेल दिया जाएगा।

क्या शासन इस प्रशासनिक सुस्ती पर नकेल कसकर तत्काल पदोन्नति आदेश जारी करेगा, या फिर महकमा यूँ ही प्रभारियों के भरोसे भगवान भरोसे चलता रहेगा